शहीद भगत सिंह…! वो नोजवान जिसने आजादी के लिए अपनी मौत को डिजाईन किया

शहीद भगत सिंह…! 21 साल का वह नौजवान जिसने भारत को आजाद करवाने के लिए खुद की मौत को डिजाईन किया। भारत देश का वो स्वतंत्रता सेनानी जिसको आज हर भारतवासी याद करता है। इतनी कम उम्र में हंसते हुए फांसी पर चढ जाना हर किसी के बस की बात नहीं होती। अमर शहीद भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की वजह से आज हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं। अंग्रेजों की नाक में दम करने वाले गर्म दल के इन तीनों नेताओं की जीवनी पढकर आपके रोंगटे खडे हो जाएगें और देश भक्ति की भावना शरीर के अंदर पैदा होगी। इनकी शहादत को हम कभी नहीं भुला सकते हैं। आईए जानते हैं इनकी जीवनी के बारे में…

शहीद भगत सिह

जन्म
अमर शहीद भगत सिंह का जन्म 1907 को लाहौर के लयालपुर में किशन सिंह के घर हुआ था। इनकी माता का नाम विद्यावति कौर था। जब थोडा बडे हुए तो इनका दिमाक काफी तेज था। ये ब्रिटिश सरकार में नहीं पढे बल्कि दयानंद एंगलो वेदिक स्कूल जो अब डीएवी के नाम से प्रख्यात है, स्कूल में पढे। इनका दिमाग इतना तेज था कि इन्होंने 150 किताबें पढ डाली जो स्कूल के अलावा थी। इनमें एकाकी की भावना जाग्रत थी जो हमें सीखनी चाहिए। ये हर जगह खडे नहीं होते थे।

शरीर की नसों में भर गई आजादी
उस समय हिंदुओं पर अत्याचार देखकर इनकी नसों में आजादी भर गई। आजादी, आजादी जहां देखों सिर्फ आजादी। 1919 में 13 अप्रैल को जब जरनल डायर ने जलियांवाला बाग में भीड पर गोलियां चलाई और लोगों को मौत के घाट उतार दिया था, तब ये घर से करीब 35 किलोमीटर दूर जलियावाला बाग में गए और लोगों को मरे हुए देखा। इनके शरीर में गुस्से की ज्वाला फूट पडी और लोगों की मौत का बदला लेने का प्रण लिया। वे वहां की मिटटी बोतल में भर लाए और देखते रहे। उनकी बहन ने पूछा कि कहां गया था तो उन्होंने कहा कि वे देशवासियों की इस मौत का बदला लेंगे। शहीद ए आजम भगत सिंह सुन्न हो गए थे और दिमाग में आजादी बैठा ली थी। भगत मात्र 13 वर्ष की उम्र के थे तो उनमें आजादी का इतना जुनून था कि कुछ भी करके आजादी चाहते थे। एक बार वे उनके पिता को बोले कि मैं देशवासियों को आजादी दिलवाकर रहूगां और बंदूखे बोउगां।

चोरा-चोरी कांड में ब्रिटिश पुलिसवालों को जिंदा जलाया
सन 1920 के समय महात्मा गांधी का नाॅनकोपरेशन मूवमेंट चल रहा था। इसका मतलब था गैरकानूनी आंदोलन। महात्मा गांधी ने कहा कि वे शांति के साथ ही देश को आजादी दिलवा देंगे। हमें बस इनका सामान रिजेक्ट करना है और दगां नहीं फैलाना है। ये महात्मा गांधी से प्रभावित थे। 1922 में बिहार के गोरखपुर में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आंदोलन चल रहा था। वहां एक जमींदार ने पुलिस थाने में कहा कि यह लोग प्रदर्शन कर रहे हैं जिससे उनके ग्राहक प्रभावित हो रहे हैं। चूंकि उस दुकान में शराब, कपडे सहित अन्य अंग्रेजी सामान बेचा जा रहा था। थाने से एक पुलिस वाला आया और कहा कि आंदोलन मत करो वरना जान से हाथ धोना पडेगा। यह सुनकर भीड ने कहा कि वे सिर्फ ब्रिटिश सामान का बहिष्कार कर रहे हैं। पुलिस वाले ने हवाई फायर किए लेकिन भीड शांत नहीं हुई। उसने तीन चार लोग जो सामने खडे थे, उनपर गोली चला दी। चूंकि पुलिस वाले तैयार नहीं थे और उनकी गोली खत्म हो गई। जैसे ही गोली खत्म हुई तो करीब 4 हजार लोगों की भीड ने थाने पर हमला बोल दिया और करीब 17 पुलिसवालों को जिंदा जला दिया और नारे लगाए गौरों वापिस जाओ, बंद करो।

महात्मा गांधी आहत हुए तो बने गर्म और नर्म दल
गोरखपुर में हुए इस कांड से महात्मा गांधी बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने नाॅन कोपरेशन मूवमेंट वापिस ले लिया। अगर यह वापिस ना लिया होता तो शायद आजादी जल्दी ही मिल जाती। भगत सिंह ने अपनी टीम बनाई और उसका गर्म दल नाम रखा। अब देश में नर्म दल और गर्म दल बने।

रशिया की बोल्शेविक क्रांति से प्रभावित हुए
चूंकि भगत सिंह किताबें पढते थे तो उन्होंने बोल्शेविक क्रांति के बारे में भी पढा था। वे इससे बहुत प्रभावित हुए और अगली रणनीति तैयार की। उन्होंने ठान लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए, अब तो लडना ही पडेगा। नाॅनकोपरेशन मूवमेंट अपनी चरम सीमा पर था और सक्सेस हो रहा था लेकिन महात्मा गांधी ने उसे वापिस ले लिया। अगर ना लेते तो आजादी जल्दी मिल गई होती।

पहले विचारधारा की क्रांति के समर्थन में थे भगत सिंह
हथियारों की क्रांति बाद में आई थी, इससे पहले भगत सिंह विचारधारा की क्रांति के समर्थन में थे। वे हर जगह अपने विचार रखते थे लेकिन कहीं भी उनकी बातों पर गौर नहीं किया जाता था। पाकिस्तान के पंजाब में स्थित लाला लाजपतराय के काॅलेज को भगत सिंह ने ज्वाईन किया। उन्होंने वहां 300 के करीब किताबें और पढ डाली। खाली तो बैठते ही नहीं थे भगत सिंह, जहां भी दिखी किताब मंगवा ली। एकाकी की भावना स्पीड से उनके दिमाग में आती थी। उन्होंने 23 साल की उम्र में वो कर दिया जो आजतक याद कर रहे हैं।

आजादी ही मेरी दुल्हन होगी
हर मां को अपना बच्चा प्यारा होता है। उस समय उसकी मां ने भगत सिंह को कहा कि अब शादी कर ले, तेरा अच्छे से ध्यान रखेगी। लेकिन भगत सिंह ने कहा कि दुल्हन ही मेरी आजादी होगी। चूंकि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उनका गुस्सा सिर पर रहता था तो आजादी के अलावा उनके दिमाग में कोई बात ही नहीं आती थी। रात्रि को ही घर पर एक चिटठी लिखकर भाग गए। काकोरी कांड को सफल बनाने के लिए उन्होंने पंडित आजाद की टीम को ज्वाईन किया। चूंकि भगत सिंह बचपन से ही कुश्ती, अभिनय, स्टेज प्रोग्राम में भाग लेते थे तो उनमें भी महारत हासिल थी।

काकोरी कांड को सफल बनाने के लिए लूटी ट्रेन
काकोरी कांड को सफल बनाने के लिए उन्होंने अपनी पंडित आजाद की टीम को ज्वाईन किया। अंग्रेजो का खजाना लूटा लेकिन पकडे गए। उस वक्त अशफाक उल्लाखान, रामप्रसाद बिसमिल को दोषी ठहराया गया और उन्हें फांसी दे दी गई। दोनों की फांसी को देखकर भगत सिंह गुस्से में आगबूबला हो गए। उन्होंने कहा सरफरोशी की तमनना अब हमारें दिल में, देखना होगा जोर कितना बाजूए कातिल में है। यह लाईन सबसे विख्यात लाईन है। इस लाईन को भगत सिंह की टेगलाईन माना जाता है। इसका मतलब यह है कि कटा लूगां सिर, ये मेरी तमना और तेरी बाजू में कातिल दम कितना है, मेरी तमन्ना ज्यादा बढी गला कटाने की कि तेरी बाजू में ताकत कितनी है देखना है।

60 हजार रूपए में करवाई जमानत
उस समय वे अखबारों में अपने नाम से लेख लिखते थे। कभी बेनामी लेख लिखते थे। पर्चे बांटते थे। इस बार दशहरा ग्राउंड में उन्होंने भीड को देखा और जागरूक करना शुरू किया। उन्होंने वहां पर पर्चे बांटे लेकिन ब्रिटिश पुलिस उनके पीछे लग गई। वहां उन्होंने बम फोडे और भाग निकले लेकिन बाद में उन्हें दबोच लिया गया। कोर्ट ने उन्हें जमानत देने के लिए 60 हजार रूपए राशि जमा करने के आदेश दिए। यह 60 हजार रूपए आज के नहीं बल्कि 90 साल पहले के हैं। आज यह राशि लाखों रूपए में पंहुच जाएगीं। लोगों ने अपनी जमीनें बेची, घर बेच दिए और 60 हजार रूपए इकटठा कर लिए और जमा करवा दिए।

लाला लाजपतराय की मौत के बाद आई आजादी रूपी सुनामी
लाला लाजपतराय चूंकि महात्मा गांधी के नर्म दल के कार्यकर्ता थे। भगत सिंह और लाला लाजपराय की विचारधारा मेल नहीं खाती थी लेकिन वे उसे पिता समान मानते थे। 1928 को लाहोर में साईमन कमीशन के खिलाफ नारेबाजी की गई। वहां पुलिस वालों ने लाठीचार्ज कर दिया जिसमें लाला लाजपत राय सहित भगत सिंह, राजगुरू, जयगोपाल, चंद्रशेखर घायल हो गए। उस वक्त लाला लाजपराय की अस्पताल में मौत हो गई। भगत सिंह ने उनकी मौत का बदला लेने का प्रण लिया।

जेम्सकोट की जगह सांडर्स को मौत के घाट उतारा
भगत सिंह, राजगुरू, जयगोपाल, राजगुरू, चंद्रशेख्र ने जेम्सकोट की मौत का प्लान बनाया। लाहोर में कोतवाली पुलिस स्टेशन के बाहर सभी ने घात लगा ली। उस समय अपनी बाइक से जेम्सकोट की जगह उप पुलिस अधीक्षक सांडर्स आए तो राजगुरू ने उनके सीने पर गोली दाग दी। इतनें में भगत सिंह ने भी उसके माथे में चार गोलिया दाग दी। उन्होंने वहां कोतवाली इलाके में पर्चे छपवाए कि उन्होंने मौत का बदला ले लिया है। वे वहां से भाग गए और डीएवी स्कूल की बिल्डिंग में छिप गए। यह कांड देखकर ब्रिटिश सरकार का दिमाग हिल गया। वहां उन्हांेने लाहौर से भागने का प्लान बनाया।

भाभी को पत्नी बनाकर कलकत्ता गए
भगत सिंह की आजादी का शोर यहीं नहीं थमा। उन्होंने उनकी भाभी दुर्गा को कुछ देर के लिए उनकी पत्नी बनने का आग्रह किया। चूंकि शहीद भगत सिंह और उसकी टीम को पकडने के लिए पुलिस ने सभी रेल मार्गों पर पुलिस तैनात कर दी थी कि कहीं से भी बचकर नहीं निकलना चाहिए। उस समय भगत सिंह ने अपनी दाडी, बाल कटवाए और राजगुरू को नौकर बनाया। अपनी पत्नी के साथ एसी डिब्बे में बैठ गए और कोलकाता के लिए रवाना हो गए। कोलकाता पंहुचने पर उन्होंने मजदूरों के खिलाफ हो रहे अत्यारों के लिए आवाज उठाई।

दिल्ली विधानसभा के अंदर बम फेंके और गिरफतारी दी
फ्रेंच क्रांति विधानसभा के अंदर बम फेंकने से प्ररेणा लेकर उन्होंने बटूकेश्वर को अपने साथ लिया और बम बनाए। उन्होंने वहां पर पर्चे भी लिखे। वे दिल्ली विधानसभा के अंदर गए और उन्होंने वहां बम फेंके और पर्चे भी फेंके जिनपर लिखा था कि बहरों को सुनाने के लिए धमाका जरूरी है। बम चूंकि ऐसे बनाए गए थे जिससे किसी को नुकसान न हो। चाहते तो वे भाग भी सकते थे लेकिन उन्होंने गिरफतारी दी। इंकलाब जिंदाबाद के साथ अंसेबली गूंज उठा। इस दोष में उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई लेकिन उनके चेहरे पर कभी भी घबराहट नहीं देखी। जेल प्रशासन के कुछ पुलिस कर्मचारी भी उनसे काफी प्रभावित थे।

अंग्रेजो की नाक में दम किया और अमर शहीद हो गए
चूंकि भगत सिंह ने काफी लिखते थे और किताबें पढते थे तो उन्होंने वहां अपनी रूचि के हिसाब से जेल अधिकारियों से पुस्तकें मंगवाना शुरू कर दिया। वे लेखक लेनिन और कालमाक्र्स से ज्यादा प्रभावित थे। उनकी किताबें पढते थे। उन्होंने अंत में कहा कि वे अब कुछ भी खाएगें पिएगें नहीं। करीब 64 दिनों तक उन्होंने कुछ भी नहीं खाया पिया। वे जेल में थे तो बाहर तुफान उफन रहा था। 2 साल के कारावास के दौरान फांसी की तारीख नजदीक आई। कोर्ट ने 24 मार्च 1931 का दिन मुकरर्र किया था लेकिन बाहर लोगों का खून खोल रहा था। जेल प्रशासन को भी डर सताने लगा था कि कहीं जेल पर भीड हमला न कर दे तो उनको 23 मार्च की रात्रि को ही फंासी दे दी गई। भीड आक्रामक न हो जाए इसलिए जेल की पिछली दिवार तोडी गई और सतलुज नहर के किनारे उनके पार्थिव शवों का सिख और हिंदू रिति रिवाज के साथ दाह संस्कार किया गया। लोगों की भीड आते देख सभी पुलिस कर्मचारी वहां से भाग निकले। लोगों ने रात भर पहरा दिया।

शहीद भगत सिह

लाखों लोगों आंसू नहीं रूके
भगत सिंह डाक्यूमेंट नामक पुस्तक के अनुसार शहीद भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव के शवों को सही ढंग से भी नहीं जलाया गया था। जब लोगों को पता चला कि भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव का परिवार बचे हुए अवशेषों को लेकर लाहौर पंहुच गया है तो लोग भावुक हो गए और अपने आंसू नहीं रोक पाए। लोगों की भीड इकटठा हो गई और 3 किलोमीटर तक शोक निकाला गया। पुरूर्षों ने विरोधास्वरूप काली पटटी और महिलाओं ने काली साडी पहन रखी थी और काले झंडे थे। जुलूस अनारकली बाजार के पास रूका। वहां उनके शवों का दाह संस्कार किया गया। उधर जेल वार्डन चरत सिंह अपने धीमें कदमों से जेल में गए और कहा कि अपने 30 साल के कार्यकाल में उन्होंने ऐसा कोई भी नहीं देखा जिसने हंसते हुए अपने देश के प्रति अपनी जान न्योछावर कर दी। अमर शहीद भगत सिंह…!

हमें गर्व करना चाहिए कि हम उस देश के वासी हैं जिस देश में शहीद भगत सिंह जैसे वीरों ने जन्म लिया। उनकी जीवनी सच में रोंगटे खडे कर देने वाली है। आपसे आशा है कि शहीद भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव के बलिदान दिवस पर आपको यह अच्छी लगी होगी और उनसे प्ररेणा भी ली होगी।

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